मूलरूप से यूपी के जौनपुर के रहने वाले 62 वर्षीय लल्लन यादव मुंबई के ओशीवारा इलाके में रहते हैं। लल्लन इस उम्र में भी टैक्सी (taxi) चलाते हैं। लॉकडाउन (lockdown) में परिवार समेत गांव चले गए थे। चूंकि परिवार में पत्नी 2 बेटे और बेटों के परिवार है, इसलिए परिवार का खर्चा पूरा हो सके अभी तक टैक्सी चला कर पैसे का योगदान दे रहे हैं। उनके दोनों बेटे भी टैक्सी ही चलाते हैं।
सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन जब से कोरोना (Coronavirus) ने दस्तक दी, लल्लन के घर की आर्थिक स्थिति लॉक हो गई। कोरोना के कारण लॉकडाउन लगा और लॉकडाउन के कारण सभी के काम धंदे बंद हो गए। काम धंदे बंद होने के बाद खाने के लाले पड़ने लगे, जिसके बाद सभी गांव आ गए। लेकिन परिवार बड़ा होने के नाते और कमाई के सभी साधन बंद होने के बाद यहां भी स्थिति और विकट हो गई। किसी तरह से 4 महीना गुजारने के बाद लल्लन परिवार सहित मुंबई यह सोच कर आ गए कि, अब तो सरकार अनलॉक कर रही है। सब कुछ पटरी पर आ रहा है। लेकिन यहाँ आने के बाद लल्लन को और अधिक विपरीत परिस्थिति का सामना करना पड़ रहा है। एक टैक्सी घर की है, उसे दिन में लल्लन चलाते हैं और रात में उनका बड़ा बेटा। जबकि छोटा बेटा मालिक की टैक्सी चलाता है, और रोज के 300 रुपया देता है।
लल्लन का कहना है कि, अब लॉकडाउन के कारण सड़कों पर यात्रीयों का टोटा पड़ा हुआ है। बमुश्किल दिन के 150 से लेकर 200 रुपये ही मिल पाते हैं, कभी तो वो भी नहीं, कितने का टैक्सी में गैस भराउं और कितना बचाऊं, समझ में नहीं आ रहा।
इसी हाल को लेकर लल्लन के बड़े बेटे राजाराम (40) कहते हैं कि, रात में पहले सब घूमने निकलते थे, लेकिन धारा 144 के कारण कोई नहीं निकलता। पहले होटल बंद थे तो कोई नही निकलता था। लेकिन जब सरकार ने होटल खोलने की अनुमति दी तो कुछ आशा जगी, लेकिन होटल खुलने के बाद भी कोई नहीं बाहर निकल रहा। हम रात रात भर खड़े खड़े यात्रीयों के इंतजार में सुबह हो जाती है और घर लौट आते हैं। कभी 200 तो कभी 150 तो कभी 250 का धंदा हो जाता है, लेकिन उसमें होगा क्या?
सबसे छोटा बेटा अभी भी घर पर खाली बैठा हुआ है। उसका कहना है कि मैं कितना कमाऊंगा और कितना मालिक को दूंगा। अब किसी प्राइवेट कंपनी या आदमी की गाड़ी पगार पर मिले, इसी प्रयास में हूँ
यही हाल ऑटो ड्राइवर (auto driver) छोटेलाल गुप्ता का है। ऑटो (auto) चलाकर अपने परिवार वाले का पेट पालने वाले गुप्ता का कहना है कि, जब से गांव से आया हूँ, तब से ही बर्बाद वाली स्थिति है। दूसरे की ऑटो चला रहा हूँ, रोज का 200 रुपया देना पड़ता है। रोज 15 से 16 घंटे ऑटो चलाता हूं तब कहीं जाकर 300 से 350 रुपये का धंदा होता है। क्या मालिक को दूं और क्या खुद के पास रखूं। सोच रहा हूँ कि फिर से गांव चला जाऊं, लेकिन स्थिति वहां तो और भी गड़बड़ है। अगर वहीँ ठीक होता तो आता ही क्यूं?
नालासोपारा में पानी-पूरी का ठेला लगा कर घर चलाने वाले रामलाल कहते हैं कि, कोरोना ने जीवन तबाह कर दिया। पहले दिन का 500 से 600 कमा लेता था, लेकिन अब ठेला लगाने को नहीं मिल रहा है। म्यूनिसिपल वाले परेशान करते हैं। अगर ठेला लगाता भी हूं तो ग्राहक ही नहीं आते। अब तो बमुश्किल 200-250 का ही धंदा होता है। घर कैसे चले, रुम का किराया कैसे दूं, बच्चों की पढ़ाई कैसे हो? समझ में नहीं आ रहा।
यह स्थिति केवल रामलाल, लल्लन या फिर छोटेलाल गुप्ता का ही नहीं है। ऐसे कितने प्रवासी श्रमिक हैं जो लॉकडाउन के बाद गांव से आने के बद स्थिति बद से बदतर हो गई है। लोगों का तो यही कहना है कि जब तक कोरोना की दवा नहीं निकल जाती या सरकार गरीबों के लिए कुछ नहीं करता तब तक ऐसी ही स्थिति रहेगी।