अपनी 65 साल की उम्र में 150 बार रक्तदान करनेवाले रत्नेश गुप्ता आज खुद एक खतरनाक बीमारी से परेशान है। ठाणे के घोरबंदर में रहनेवाले रत्नेश गुप्ता 65 साल के हो गए है। रत्नेश का एक अच्छा खासा गृहस्थ परिवार है, पत्नी औऱ दो बेटों के साथ उन्होने अपनी अब तक की जिंदगी गुजारी है। मुलरुप से रत्नेश गुप्ता मुंबई से है ,जिसके कारण उन्हे इस शहर से एक अलग ही लगाव है। रत्नेश कॉलेज के समय से ही अलग अलग सामाजिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे, लेकिन उन्हे क्या पता था की जिस नेकी के दरिया में वो आज चल रहे है , कल यहा दरियां उनके लिए मुसीबतों का पहाड़ बन जाएगा।
150 से भी ज्यादाबार रक्तदान
रत्नेश का ब्लड ग्रुप बी निगेटीव है जो आसानी से नहीं मिलता है। घाटकोपर के एक अस्पताल में एक मरीज को इस ग्रुप की खुन की जरुरत थी, रत्नेश को जब इस बात की जानकारी मिली तो वो तुरंत ही मरीज को रक्त देने के लिए अस्पताल पहुंच गए। उन दिनों रत्नेश स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे और स्कूल अस्पताल के काफी करीब ही था। रत्नेश रक्तदान के कारण उस मरीज की जान बच पाई।
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बी नेगेटिव की अहमियत
दरअसल जब रत्नेश को इस बात का अंदाजा हुआ की उसका ब्ल़डग्रुप काफी रेयर है और इससे कईयों की जान बच सकती है , तो रत्नेश ने हर तीन महीने में रक्तदार करना शुरु किया जिससे कईयों की जान बचाई जा सके। बीमारी से पहले रत्नेश ने 150 से भी अधिक बार रक्तदान किया था।
पैनक्रियाज कैंसर से परेशान
रत्नेश पिछलें 2 सालों से पैनक्रियाज कैंसर से पीड़ित है। उनका ये कैंसर उनके उपर इतना खतरनाक हो गया की उन्हे माउथ कैंसर भी हो गया जिसका ऑपरेशन करना पड़ा। रत्नेश पैनक्रियाज कैंसर के चौथे स्टेज पर है। जिसके कारण वह अपना पूरा समय अपने परिवार के साथ बिताते है। रत्नेश का कहना है की आज इस बीमारी की के कारण भले ही वो रक्तदान नहीं कर पा रहे है , लेकिन वो लोगों को रक्तदान की अहमियत को लोगों को जरुर समझाएंगे।
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राष्ट्रीय पुरस्कार से किया गया है सम्मानित
चेंबूर में आरसीएफ कारखाने से रत्नेश गुप्ता अधिकारी के रूप में सेवानिवृत्त हुए हैं। उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार प्राप्त हुए। 3 नेशनल अवार्ड , श्रमवीर पुरस्कार, महाराष्ट्र सरकार का सर्वश्रेष्ठ कार्यकर्ता पुरस्कार, और केंद्रीय श्रम मंत्री राष्ट्रीय पुरस्कार जैसे पुरस्कारों से भी उन्हे सम्मानित किया गया है।